इतिहास की मेज पर भूगोल का दर्द
इतिहास की मेज पर भूगोल का दर्द

इतिहास की मेज पर भूगोल का दर्द

बद्रीनाथ वर्मा    18-Aug-2026
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प्राकृतिक न्याय और आर्थिक जनसांख्यिकी के आधार पर लाहौर भारत के हिस्से में आना तय था क्योंकि वहां की अधिकांश संपत्ति और राजस्व हिंदुओं का था। लेकिन कूटनीति के बंद कमरों में भूगोल ही बदल दिया। रेडक्लिफ ने बाद में माना कि न कोई सटीक नक्शा था और न ही जमीनी समझ। लाहौर प्राकृतिक रूप से भारत का ही हिस्सा होना चाहिए था। लेकिन लाहौर को भारत से निकालकर पाकिस्तान को देना उनकी मजबूरी थी। आखिरकार उन्होंने तथ्यों से परे जाकर लाहौर पाकिस्तान को दे दिया।
जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई अर्थात जिसने लाहौर नहीं देखा, वो पैदा ही नहीं हुआ। असगर वजाहत के नाटक का यह संवाद उस लाहौरी तहजीब का मर्सिया है जो साल 1947 की तपती गर्मियों में मजहबी जुनून की भेंट चढ़ गई। 17 अगस्त 1947 को जब सर सिरिल रेडक्लिफ की खींची लकीरें सार्वजनिक हुईं, तो महज 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अमृतसर और लाहौर के बीच एक ऐसा फासला पैदा हो गया जो आज भी इतिहास के सीने पर एक रिसता हुआ जख्म है।
लहंदे पंजाब और चढ़दे पंजाब के बीच बंटी इस साझी विरासत का इतिहास बेहद समृद्ध था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के पुत्र लव ने इस शहर को बसाया था। आधुनिक काल में यह महाराजा रणजीत सिंह की संप्रभुता का प्रतीक बना तो स्वतंत्रता आंदोलन में लाला लाजपत राय, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की वैचारिक और क्रांतिकारी कर्मभूमि रहा। विज्ञान की दुनिया में भारत का नाम रोशन करने वाले दो नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. हरगोविंद खुराना और डॉ. सुब्रमण्यम चंद्रशेखर भी इसी शहर की आबोहवा से ताल्लुक रखते थे। यह शहर भारतीय उपद्वीप के इतिहास का प्रस्थान बिंदु था।
लगभग एक हजार साल में गजनवी, मंगोल, मुगल, अफगान, सिख और फिर ब्रितानिया हुकूमत में इस शहर ने दर्जनों बार अपना लिबास बदला। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि वर्ष 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने इसी लाहौर में रावी तट पर पूर्ण स्वराज का ऐतिहासिक नारा बुलंद किया था और ठीक 11 साल बाद, 23-24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने इसी शहर से लाहौर प्रस्ताव पारित कर देश के विभाजन की नींव रख दी।
विडंबना ही है कि वर्ष 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने जिस लाहौर में रावी तट पर पूर्ण स्वराज का ऐतिहासिक नारा बुलंद किया था। ठीक 11 साल बाद, 23-24 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने उसी शहर से लाहौर प्रस्ताव पारित कर देश के विभाजन की नींव रख दी।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में ब्रिटेन की सत्ता लेबर पार्टी के क्लेमेंट एटली के हाथों में आई। इसके बाद ब्रिटिश भारत में चुनाव घोषित हुए। पंजाब विधानसभा की 175 सीटों में से 86 सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित थीं जबकि सरकार बनाने का जादुई आंकड़ा 88 था। स्वीडन के राजनीतिशास्त्री प्रोफेसर इश्तियाक अहमद अपनी पुस्तक ‘द पंजाब ब्लडीड पार्टिशन्ड एंड क्लीनसेड’ में लिखते हैं कि यह चुनाव पूरी तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ गया था।
मुस्लिम लीग ने चुनावी मैदान में मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का जमकर शोषण किया। तत्कालीन पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी के धर्मनिरपेक्ष सिख नेता सर खिजर हयात खान टिवाना की मां-बहनों को लेकर अपमानजनक नारे लगाए गए। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अपने मुस्लिम कार्यकर्ताओं को लीग के पक्ष में प्रचार करने भेजा जिन्होंने यह भ्रम फैलाया कि सोशलिस्ट इस्लामिक पाकिस्तान में उन्हें हिंदू और सिख साहूकारों से मुक्ति मिलेगी।
चुनाव नतीजों में मुस्लिम लीग को बहुमत तो नहीं मिला लेकिन वह 73 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस, अकाली दल और यूनियनिस्ट पार्टी ने मिलकर खिजर टिवाना के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाई। लेकिन लाहौर के मुस्लिम बहुसंख्यक इस सरकार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। मार्च 1947 आते-आते लाहौर एक बारूद के ढेर पर बैठ चुका था। मोहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के आह्वान के बाद कलकत्ता और नोआखली में हुआ खून-खराबा अब पंजाब की दहलीज पर था।
2 मार्च 1947 को बढ़ते दबाव के बीच सर खिजर टिवाना ने इस्तीफा दे दिया। 3 मार्च को पंजाब विधानसभा के बाहर सिख नेता मास्टर तारा सिंह ने कृपाण लहराते हुए पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा दिया और कहा कि वे किसी भी कीमत पर पंजाब में मुस्लिम लीग की हुकूमत नहीं बनने देंगे। अगले ही दिन, 4 मार्च 1947 को लाहौर की सड़कों पर हिंसा भड़क उठी। गवर्नमेंट कॉलेज के पास प्रदर्शन कर रहे हिंदू-सिख छात्रों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें कई छात्र मारे गए। शाम होते-होते कानून का इकबाल खत्म हो चुका था।
लाहौर में मुस्लिम आबादी 60 प्रतिशत थी और हिंदू-सिख 40 प्रतिशत थे। लेकिन शहर के आर्थिक तंत्र, व्यापार, शिक्षा और बैंकों पर हिंदू-सिखों का पूर्ण नियंत्रण था। लेकिन माहौल ऐसा बना कि फादर ऑफ मॉडर्न लाहौर कहे जाने वाले सर गंगा राम के परिवार और दयाल सिंह मजीठिया के वंशजों को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। मई 1947 तक लाहौर का रईस और प्रभावशाली हिंदू वर्ग शहर छोड़ चुका था। 20-21 जून की रात को मजिस्ट्रेट और स्थानीय गुंडे बिल्ला जट्ट की साठगांठ से हिंदुओं की समृद्ध बस्ती शाह आलमी को आग के हवाले कर दिया गया। इसमें सैकड़ों लोग जिंदा जल गए। रावी का पानी लाल हो चुका था और लाहौर से अमृतसर जाने वाली ट्रेनें लाशों से पटकर आ रही थीं।
लाहौर में मुस्लिम आबादी 60 प्रतिशत थी और हिंदू-सिख 40 प्रतिशत थे। लेकिन शहर के आर्थिक तंत्र, व्यापार, शिक्षा और बैंकों पर हिंदू-सिखों का पूर्ण नियंत्रण था। लेकिन माहौल ऐसा बना कि आधुनिक लाहौर का जनक कहे जाने वाले सर गंगा राम के परिवार और दयाल सिंह मजीठिया के वंशजों को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। 3 जून 1947 को भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने भारत के विभाजन का माउंटबेटन प्लान सार्वजनिक किया। इसके तहत पंजाब के 29 जिलों को धार्मिक जनसांख्यिकी के आधार पर बांटा जाना था। इसमें 17 जिले मुस्लिम बहुल और 12 जिले हिंदू-सिख बहुल थे। इस विशाल उपमहाद्वीप को बांटने की जिम्मेदारी सौंपी गई लंदन के एक बैरिस्टर सर सिरिल रेडक्लिफ को जो इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुंचे रेडक्लिफ को पंजाब की तपती दोपहरी और भयंकर लू के बीच महज पांच हफ्तों में 1,75,000 वर्ग मील के क्षेत्र का सीमांकन करना था।
रेडक्लिफ ने बाद में खुद स्वीकार किया था कि जून-जुलाई की गर्मी में फील्ड सर्वे करना नामुमकिन था। उन्होंने बिना जमीनी हकीकत जाने केवल जनगणना रिपोर्टों, पुराने नक्शों, हवाई दौरों और चार सहयोगियों की मदद से कागजों पर पेंसिल से लकीरें खींच दीं। 12 अगस्त को नक्शा तैयार हो गया लेकिन माउंटबेटन ने स्वतंत्रता दिवस के जश्न में खलल न पड़े इसलिए इसे 17 अगस्त को सार्वजनिक किया।
प्राकृतिक न्याय और आर्थिक जनसांख्यिकी के आधार पर लाहौर भारत के हिस्से में आना तय था क्योंकि वहां की अधिकांश संपत्ति और राजस्व हिंदुओं का था। लेकिन कूटनीति के बंद कमरों में इतिहास कुछ और ही लिख रहा था। वर्ष 1971 में सियालकोट में जन्मे प्रख्यात भारतीय पत्रकार कुलदीप नैयर ने लंदन में सर सिरिल रेडक्लिफ के घर का दरवाजा खटखटाया और उनसे लाहौर को पाकिस्तान को देने का असल सबब पूछा। नैयर ने अपनी किताब ‘स्कूप इनसाइड स्टोरीज फ्रॉम द पार्टिशन टू द प्रजेंट’ में रेडक्लिफ के उस चौंकाने वाले कबूलनामे को दर्ज किया है।
नैयर से बातचीत में रेडक्लिफ ने बताया कि उन्होंने देखा कि लाहौर में हिंदुओं की संपत्ति और व्यापार अधिक है, इसलिए प्राकृतिक रूप से वह भारत का ही हिस्सा होना चाहिए था। वे उसे लगभग भारत को दे ही चुके थे लेकिन तभी उन्हें अहसास हुआ कि कलकत्ता तो पहले ही भारत के नाम हो चुका है, ऐसे में अगर लाहौर भी भारत को दे दिया गया तो पाकिस्तान के पास कोई भी बड़ा और विकसित शहर नहीं बचेगा। रेडक्लिफ के अनुसार पाकिस्तान के लोग भले ही उन पर भारत का पक्ष लेने का आरोप लगाएं। लेकिन सच यह है कि उन्होंने तथ्यों से परे जाकर लाहौर उन्हें दिया। उनके पास केवल 10-11 दिन का प्रभावी समय था न कोई सटीक नक्शा था और न ही जमीनी समझ। लाहौर को भारत से निकालकर पाकिस्तान को देना उनकी मजबूरी थी।
रेडक्लिफ की इस मजबूरी, गलती या बेईमानी ने इतिहास की धारा को हमेशा के लिए मोड़ दिया। 2900 किलोमीटर लंबी रेडक्लिफ रेखा ने न केवल जमीनों को बांटा, बल्कि नदियों के बहाव, रेल मार्गों, सिंचाई प्रणालियों और सबसे बढ़कर सदियों पुराने इंसानी रिश्तों को दो टुकड़ों में चीर दिया। यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा और सबसे क्रूर विस्थापन था जिसमें एक करोड़ से अधिक लोग शरणार्थी बन गए और लाखों बेगुनाह मारे गए।
आज भी जब कोई इतिहास का मुसाफिर वाघा बॉर्डर पर खड़ा होकर लाहौर की तरफ देखता है, तो उसके जहन में असगर वजाहत, मंटो और कुलदीप नैयर की बातें तैरने लगती हैं। तथ्य गवाही देते हैं कि लाहौर भारत का ही था, बशर्ते रेडक्लिफ ने भूगोल की मेज पर वह इंसाफ की बेईमानी न की होती। इतिहास ने खुद को बदल लिया, लेकिन रावी के पानी में आज भी उस साझी तहजीब की सिसकियां सुनाई देती हैं जो लाहौर के छूटने के साथ ही हमेशा के लिए अधूरी रह गई।
(लेखक नवोत्थान के संपादक हैं)