नये भारत की कल्चरल डिप्लोमेसी

17 Aug 2026 16:24:41
 
Modi
संस्कृति और सभ्यता को विदेश नीति का मुख्य हिस्सा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक समुदाय को यह संदेश दिया है कि भारत का उदय दुनिया के लिए कोई खतरा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक शांति का एक नया सवेरा है। उनकी इस सांस्कृतिक कूटनीति की सबसे बड़ी सफलता तो यही है कि विदेशों में अवैध रूप से ले जाई गई भारत की प्राचीन मूर्तियों और ऐतिहासिक धरोहरों की लगातार वापसी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कल्चरल डिप्लोमेसी महज़ कूटनीति नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना का वैश्विक विस्तार है। संस्कृति और सभ्यता को विदेश नीति का मुख्य हिस्सा बनाकर उन्होंने वैश्विक समुदाय को यह संदेश दिया है कि भारत का उदय दुनिया के लिए कोई खतरा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक शांति का एक नया सवेरा है। उनकी इस सांस्कृतिक कूटनीति की सबसे बड़ी सफलता तो यही है कि विदेशों में अवैध रूप से ले जाई गई भारत की प्राचीन मूर्तियों और ऐतिहासिक धरोहरों की लगातार वापसी हो रही है। नीदरलैंड द्वारा चोल साम्राज्य के ताम्रपत्रों को लौटाना और अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से सैकड़ों वर्ष पुरानी प्राचीन मूर्तियों का सम्मानपूर्वक भारत वापस आना मोदी सरकार की सफल कल्चरल डिप्लोमेसी का उदाहरण है।
प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का पिछले 12 वर्षों का कालखंड केवल शासन या सत्ता परिवर्तन का गवाह नहीं रहा बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण के साथ सांस्कृतिक डिप्लोमेसी का उच्चतम प्रतीक बनकर उभरा है। इस अवधि ने भारत के सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक स्वरूप को तो संवारा ही है। लेकिन सबसे गहरा और अमिट प्रभाव भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य पर छोड़ा है। भारत ने अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को एक नई ऊर्जा और भव्यता प्रदान की है। इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान के केंद्र में हमारी आस्था और अस्मिता के प्रतीकों का पुनरुद्धार तो रहा ही है वैश्विक स्तर पर भी इसे नई पहचान मिली है।
सदियों की लंबी प्रतीक्षा और संघर्ष के बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक मंदिर का निर्माण न होकर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, उज्जैन में महाकाल लोक का अलौकिक निर्माण और केदारनाथ धाम का व्यापक पुनर्विकास जैसी परियोजनाओं ने भारत की आध्यात्मिक धरोहर को न केवल सहेजा है बल्कि उन्हें एक वैश्विक पहचान भी दिलाई है। सांस्कृतिक गौरव की इस पुनर्स्थापना का विस्तार सोमनाथ मंदिर के नए स्वरूप से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर में कामाख्या मंदिर कॉरिडोर के विकास और कश्मीर में शारदा पीठ के पुनरुद्धार के संकल्प तक दिखाई देता है। देश के साथ विदेशों में भी इसकी गूंज सुनाई देती है।
बहरहाल, जुलाई की शुरुआत में संपन्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा भी भारत की सांस्कृतिक चेतना का विस्तार ही माना जाना चाहिए। यह यात्रा सिर्फ कूटनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रही। जकार्ता पहुंचने के बाद उनका सबसे अहम पड़ाव दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर परिसरों में से एक प्रम्बानन मंदिर था। प्रधानमंत्री ने मंदिर परिसर पहुंचकर भारत और इंडोनेशिया के साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों को नई मजबूती देने का संदेश दिया। प्रधानमंज्ञी मोदी की यह यात्रा एक बार फिर उस रणनीति का हिस्सा साबित हुई जिसे पिछले कुछ वर्षों में मंदिर डिप्लोमेसी माना जाता है। बीते एक दशक में भारत ने सिर्फ अपने देश के मंदिरों और विरासत स्थलों के संरक्षण पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत कई देशों में स्थित प्राचीन हिंदू और बौद्ध धरोहरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस कड़ी में सबसे चर्चित परियोजनाओं में बांग्लादेश का रामना काली मंदिर है। 1971 में पाकिस्तान के ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान इस ऐतिहासिक मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था। मोदी सरकार ने इसके पुनर्निर्माण में सहयोग देने का फैसला किया और 2021 में इसका पुनर्निर्मित स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए समर्पित किया गया। इसे भारत और बांग्लादेश के साझा सांस्कृतिक संबंधों का बड़ा प्रतीक माना गया। बांग्लादेश में ही भारत ने लगभग 300 साल पुराने जय काली माता मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए भी आर्थिक सहायता दी। इसके अलावा आनंदमयी काली माता मंदिर और रामकृष्ण मंदिर के संरक्षण में भी भारत ने सहयोग किया।
2024 से भारत ने लाओस के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल वाट फू मंदिर परिसर में भी संरक्षण कार्य शुरू किया। करीब एक हजार वर्ष पुराने इस शिव मंदिर को दक्षिण-पूर्व एशिया में सनातन परंपरा के सबसे पुराने प्रतीकों में माना जाता है। इन परियोजनाओं का मकसद सिर्फ प्राचीन मंदिरों की मरम्मत कराना नहीं है। इसके जरिए भारत उन देशों के साथ अपने हजारों साल पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को भी मजबूत कर रहा है, जहां कभी भारतीय संस्कृति, हिंदू और बौद्ध परंपराओं का गहरा प्रभाव रहा है।
भारत की सांस्कृतिक कूटनीति सिर्फ पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं रही। वियतनाम के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल माय सोन सैंक्चुअरी के संरक्षण में भी भारत ने अहम भूमिका निभाई। यह कभी प्राचीन चंपा साम्राज्य का धार्मिक केंद्र था और दक्षिण-पूर्व एशिया में शैव परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। भारत और वियतनाम के बीच 2014 में हुए समझौते के बाद यहां संरक्षण का काम आगे बढ़ा। 2016 के भूकंप में म्यांमार के ऐतिहासिक बागान पुरातात्विक क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद 2017 में भारत और म्यांमार के बीच समझौता हुआ। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यहां 12 ऐतिहासिक पैगोडा और प्रसिद्ध आनंदा मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन का काम पूरा किया।
इसी तरह 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने 5 करोड़ डॉलर के पुनर्निर्माण पैकेज की घोषणा की। इसके तहत 28 सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण और पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ। इनमें प्रसिद्ध सेतो मच्छिंद्रनाथ मंदिर और बूढ़ानीलकंठ मंदिर धर्मशाला जैसे ऐतिहासिक स्थल शामिल हैं। कंबोडिया का अंगकोर वाट और ता प्रोहम मंदिर परिसर दुनिया में हिंदू सभ्यता की सबसे भव्य धरोहरों में गिने जाते हैं। भारत ने इन स्थलों के संरक्षण और संरचनात्मक मरम्मत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अलावा प्रीह विहार परिसर में भी भारत संरक्षण कार्यों से जुड़ा रहा। 2019 में प्रधानमंत्री मोदी ने बहरीन की यात्रा के दौरान करीब 200 साल पुराने श्रीनाथजी मंदिर के पुनर्विकास परियोजना का उद्घाटन किया। खाड़ी क्षेत्र के सबसे पुराने हिंदू मंदिरों में शामिल इस मंदिर का पुनर्निर्माण भारतीय सहयोग से हुआ। वहीं श्रीलंका में भारत ने ऐतिहासिक तिरुकेतीश्वरम मंदिर के पुनर्स्थापन के लिए अनुदान सहायता दी। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर श्रीलंका के पांच प्राचीन पंच ईश्वरम मंदिरों में शामिल है।
सांस्कृतिक डिप्लोमेसी का यह सफर यहीं नहीं रुका। 2024 से भारत ने लाओस के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल वाट फू मंदिर परिसर में भी संरक्षण कार्य शुरू किया। करीब एक हजार वर्ष पुराने इस शिव मंदिर को दक्षिण-पूर्व एशिया में सनातन परंपरा के सबसे पुराने प्रतीकों में माना जाता है। इन परियोजनाओं का मकसद सिर्फ प्राचीन मंदिरों की मरम्मत कराना नहीं है। इसके जरिए भारत उन देशों के साथ अपने हजारों साल पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को भी मजबूत कर रहा है, जहां कभी भारतीय संस्कृति, हिंदू और बौद्ध परंपराओं का गहरा प्रभाव रहा है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री मोदी इंडोनेशिया के ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर पहुंचे तो, यह यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल के दर्शन तक सीमित नहीं रह जाती। यह भारत की उस व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा बन जाती है, जिसके जरिए भारत दुनिया के अलग-अलग देशों में मौजूद साझा विरासत को संरक्षित करने और सभ्यतागत संबंधों को नई ऊर्जा देने का प्रयास कर रहा है।
इंडोनेशिया दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशियाई संसद की स्पीकर पुआन महारानी को ओडिशा की प्रसिद्ध इकट (बंधा) कला से तैयार रेशमी वस्त्र भेंट किया। यह हैंडलूम परंपरा अपनी जटिल टाई-एंड-डाई तकनीक, आकर्षक डिजाइनों और चमकदार रंगों के लिए जानी जाती है। संबलपुर, नुआपटना और बरगढ़ जैसे बुनाई केंद्रों में तैयार होने वाला यह वस्त्र ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान और समृद्ध शिल्प परंपरा का प्रतीक माना जाता है। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान वहां के गवर्नर-जनरल को बिहार के मिथिला क्षेत्र की प्रसिद्ध मधुबनी पेंटिंग भेंट की। इस लोक कला में प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक शैली से मोर तथा पेड़-पौधों का चित्रण किया गया है। यह चित्र प्रकृति, समृद्धि, पर्यावरण संरक्षण और भारतीय लोक संस्कृति का संदेश देता है।
प्रधानमंज्ञी मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की पत्नी को कश्मीर की पारंपरिक कढ़ाई से सजी शुद्ध ऊन की स्टॉल भेंट की। यह स्टॉल उच्च गुणवत्ता वाली ऊन से तैयार की गई है और उस पर कश्मीर घाटी की प्राकृतिक सुंदरता से प्रेरित फूलों की महीन कढ़ाई की गई है। यह कश्मीर की सदियों पुरानी वस्त्र कला और हस्तशिल्प परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। वहीं प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज को दो विशेष उपहार दिए। पहला जनजातीय ढोकरा कला से बनी धातु की नाव, जो भारत की सबसे प्राचीन धातु कला परंपराओं में से एक का प्रतीक है। यह धातु की नाव 'लॉस्ट वैक्स कास्टिंग' तकनीक से तैयार की गई है और इसमें सवार आदिवासी पुरुषों और महिलाओं को दर्शाती है। यह कलाकृति एकता, सहयोग और साझा प्रगति का संदेश देती है।
अल्बनीज को दूसरा उपहार इंडियन प्रीमियम कॉफी बॉक्स था, जिसमें भारत के प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्रों की चुनिंदा प्रीमियम कॉफी शामिल है। यह भारत के कॉफी उद्योग, भारतीय कॉफी की गुणवत्ता, कॉफी की खेती और वैश्विक स्तर पर बढ़ती भारतीय कॉफी की पहचान को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया के विपक्ष के नेता को राजस्थान की प्रसिद्ध लकड़ी नक्काशी कला से तैयार जालीदार हस्तनिर्मित हाथी भेंट किया। एक ही लकड़ी के टुकड़े से बनाई गई यह कलाकृति भारतीय शिल्पकारों की बारीक कारीगरी का शानदार नमूना है। भारतीय संस्कृति में हाथी बुद्धिमत्ता, समृद्धि और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया के गवर्नर-जनरल को मार्बल इनले वर्क बॉक्स भेंट किया, जो भारत की प्रसिद्ध पीएत्रा ड्यूरा कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें संगमरमर पर अर्ध-कीमती पत्थरों की जड़ाई कर आकर्षक फूलों के डिजाइन बनाए गए हैं। यह भारतीय कारीगरों की सूक्ष्म कला और उत्कृष्ट शिल्प कौशल को दर्शाता है।
न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन को प्रधानमंत्री मोदी ने दो खास उपहार दिए। पहला, पारंपरिक उत्तराखंडी टोपी, जो हिमालयी संस्कृति, सम्मान और स्थानीय परंपराओं का प्रतीक है। दूसरा, भारतीय महिला हॉकी टीम के सभी खिलाड़ियों के हस्ताक्षर वाली हॉकी स्टिक, जो न्यूजीलैंड में आयोजित एफआईएच हॉकी महिला नेशंस कप में भारत की ऐतिहासिक जीत की यादगार के रूप में भेंट की गई। यह भारतीय खेल भावना, टीमवर्क और उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रतीक है। इसी के साथ छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की प्रसिद्ध ढोकरा 'ट्री ऑफ लाइफ' (जीवन वृक्ष) मूर्ति भेंट की। न्यूजीलैंड के विपक्ष के नेता क्रिस हिपकिंस को प्रधानमंत्री मोदी ने लखनऊ की प्रसिद्ध जरी-जरदोजी वॉल हैंगिंग भेंट की। धातु के तारों, मोतियों, सीक्विन और अन्य सजावटी तत्वों से तैयार यह कलाकृति भारत की सदियों पुरानी जरदोजी कढ़ाई परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह समृद्धि, सौहार्द, रचनात्मकता और भारतीय हस्तशिल्प की विरासत का प्रतीक मानी जाती है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भेंट किए गए ये सभी उपहार केवल स्मृति चिह्न नहीं हैं, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्प, लोक कलाओं और कारीगरों की उत्कृष्ट प्रतिभा को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने का माध्यम भी हैं।
( लेखक नवोत्थान के संपादक हैं)
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