बद्रीनाथ वर्मा
स्वतंत्र भारत के इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख एक ऐसे गहरे जख्म की तरह दर्ज है जिसकी टीस आधी सदी बीत जाने के बाद भी कम नहीं हुई है। आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर जब हम उस दौर को याद करते हैं तो लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, नागरिक स्वतंत्रता के दमन और सत्ता की असीमित भूख का एक खौफनाक मंजर सामने आता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में 1970 का दशक एक ऐसी करवट का गवाह बना, जिसने सत्ता के अहंकार और जनशक्ति के टकराव को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। आपातकाल की पृष्ठभूमि रातोंरात तैयार नहीं हुई थी बल्कि इसके पीछे बिहार की धरती पर सुलग रहा वह जनाक्रोश था जो तत्कालीन कांग्रेस सरकार की जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ उबल रहा था।
आज पचास साल बाद उन काले दिनों को याद करना केवल अतीत का विलाप नहीं है। यह भविष्य के लिए एक ऐसी चेतावनी और गवाही है जिसे संजोकर रखना हर उस नागरिक का कर्तव्य है जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है। ताकि सनद रहे कि सत्ता जब भी निरंकुश होगी। तब प्रतिरोध की सबसे बुलंद आवाज इस मिट्टी से उठेगी। बिहार आंदोलन और जेपी की संपूर्ण क्रांति महज अतीत के किस्से न होकर हर दौर की सत्ता के लिए एक शाश्वत चेतावनी है कि जब-जब देश में असंतोष की आवाज को दबाने की कोशिश होगी। तब-तब किसी कोने से जेपी की वैचारिक विरासत फिर उठ खड़ी होगी। महंगाई, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू बिहार आंदोलन, जयप्रकाश नारायण और 25 जून 1975 की आपातकाल की त्रिवेणी एक ऐसा काला अध्याय बनकर उभरती है जिसे बार-बार याद किया जाना चाहिए। ताकि सनद रहे कि जनता जब जागती है तो सिंहासन डोलने लगते हैं।
इसकी शुरुआत साल 1974 में बिहार की धरती से हुई थी। बेरोजगारी, महंगाई और आकंठ भ्रष्टाचार से त्रस्त छात्रों ने एक बिगुल फूंका था। यह सिर्फ एक प्रांतीय असंतोष नहीं था बल्कि व्यवस्था के सड़ चुके ढांचे के खिलाफ एक सीधी चुनौती थी। गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन से प्रेरणा लेकर बिहार के युवाओं ने जब व्यवस्था परिवर्तन का बीड़ा उठाया तो उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो निष्पक्ष हो। जिसका नैतिक कद ऊंचा हो और जो सत्ता की राजनीति से दूर हो। यह तलाश पूरी हुई जयप्रकाश नारायण के रूप में। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन की कमान संभाली। उन्होंने इस छात्र आंदोलन को सरकार बदलने के उपक्रम से बढ़कर संपूर्ण क्रांति बना दिया। जेपी का मानना था कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक बदलाव की बयार नहीं पहुंचती। जब तक प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होता, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में 1970 का दशक एक ऐसी करवट का गवाह बना जिसने सत्ता के अहंकार और जनशक्ति के टकराव को हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। आपातकाल की पृष्ठभूमि रातोंरात तैयार नहीं हुई थी बल्कि इसके पीछे बिहार की धरती पर सुलग रहा वह जनाक्रोश था जो तत्कालीन कांग्रेस सरकार की जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ उबल रहा था। महंगाई, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू बिहार आंदोलन, जयप्रकाश नारायण और 25 जून 1975 की आपातकाल की त्रिवेणी को बार-बार याद किया जाना चाहिए। ताकि सनद रहे कि जनता जब जागती है तो सिंहासन डोलने लगते हैं।
देश के पहले मीसाबंदी के तौर पर 16 महीने जेल में बंद रहे वरिष्ठ पत्रकार व पद्मभूषण से सम्मानित राम बहादुर राय का कहना है कि भले ही बिहार आंदोलन गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन से प्रेरित था। लेकिन दोनों आंदोलनों में फर्क था। जहां गुजरात आंदोलन अनियोजित था वहीं बिहार आंदोलन पूरी तरह से सुनियोजित था। बहुत सोच विचार कर व बड़ी तैयारी के साथ इसकी रूपरेखा तैयार की गई थी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की कमान संभालने के बाद इसने एक राष्ट्रव्यापी रूप अख्तियार कर लिया। जेपी ने स्पष्ट किया था कि यह लड़ाई सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं बल्कि समाज के हर स्तर पर संपूर्ण क्रांति लाने की है।
पटना के गांधी मैदान में जब जेपी ने "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" का उद्घोष किया तो दिल्ली के सत्ता गलियारों में हलचल मच गई। जेपी का आंदोलन आत्मशुद्धि, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर आधारित था। इसने देश के युवाओं को एक नई वैचारिक ऊर्जा से भर दिया। जेपी का मानना था कि आंदोलन केवल सरकार को बदलने के लिए नहीं है बल्कि उस व्यवस्था को बदलने के लिए है जो भ्रष्टाचार और दमन को जन्म देती है। लेकिन तात्कालिक इंदिरा गांधी सरकार ने इस जन-उबाल को व्यवस्था के लिए सुधार का संकेत मानने के बजाय अपनी सत्ता के लिए एक गंभीर खतरा माना।
जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया तो नैतिक रूप से घिरी इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देकर लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करने के बजाय दमन का रास्ता चुना और 25 जून 1975 की आधी रात को देश पर आपातकाल थोप दिया। आपातकाल लगते ही देश लोकतंत्र के सबसे स्याह अध्याय में प्रवेश कर गया। जेपी, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी व चंद्रशेखर सहित विपक्ष के हजारों नेताओं को रातों-रात जेल में डाल दिया गया। अखबारों की स्वतंत्रता छीन ली गई। प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और नागरिकों की अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। जेल में बंद जेपी का स्वास्थ्य तेजी से गिरा। लेकिन उनका हौसला अटूट रहा। सलाखें भी उस वैचारिक ज्वाला को नहीं बुझा सकीं जो उन्होंने देश के मानस में जला दी थी।
भले ही बिहार आंदोलन गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन से प्रेरित था। लेकिन दोनों आंदोलनों में फर्क था। जहां गुजरात आंदोलन अनियोजित था वहीं बिहार आंदोलन पूरी तरह से सुनियोजित था। बहुत सोच विचार कर व बड़ी तैयारी के साथ इसकी रूपरेखा तैयार की गई थी।– रामबहादुर राय देश के पहले मीसाबंदी
अंततः 1977 में जब आपातकाल हटा और चुनाव हुए तो भारत की मूक जनता ने बैलेट के जरिए वह कर दिखाया जिसकी कल्पना तानाशाहों ने कभी नहीं की थी। कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर उस काले अध्याय को बार-बार याद करना इसलिए भी जरूरी है ताकि सनद रहे कि देश की जनता भले ही शांत दिखे। लेकिन वह अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से कभी समझौता नहीं करती। यह इतिहास इस बात का गवाह है कि संस्थाओं की स्वायत्तता सर्वोपरि है और न्यायपालिका या प्रेस को दबाने का नतीजा हमेशा आत्मघाती होता है। सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो। कोई भी नेता संविधान से बड़ा नहीं हो सकता और जनभावनाओं के आगे अंततः उसे झुकना ही पड़ता है।
इस पूरे घटनाक्रम को बिहार के परिप्रेक्ष्य में देखने पर यह केवल एक काले अध्याय की गाथा न रहकर दमन के खिलाफ जनक्रांति के उदय, वैचारिक अस्मिता की लड़ाई और भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने वाला सबसे प्रखर दस्तावेज बन जाता है। बिहार और आपातकाल का संबंध केवल उत्पीड़क और पीड़ित का नहीं था बल्कि बिहार उस पूरे दौर में प्रतिपक्ष की भूमिका का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु था। बिहार ने दिल्ली के सिंहासन को हिलाकर रख दिया था। संपूर्ण क्रांति का जो शंखनाद पटना के गांधी मैदान से हुआ था उसकी गूंज ने ही अंततः उस तानाशाही व्यवस्था को घुटने टेकने पर मजबूर किया जिसने पूरे देश को एक विशाल कारागार में तब्दील कर दिया था।
1974 के मार्च महीने में बिहार के छात्रों ने जिस आंदोलन की शुरुआत की थी वह धीरे-धीरे एक राष्ट्रव्यापी महाआंदोलन में बदल गया। बिहार के गांव-गांव और कस्बों से उठे युवाओं के इस सैलाब ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भीतर तक डरा दिया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला और उसके बाद देश भर में बढ़ता जनदबाव तो महज तात्कालिक कारण बने असल में सत्ता को सबसे बड़ा खतरा बिहार की उस वैचारिक चेतना से था जो समूचे देश को जगा रही थी। यही वजह थी कि जब 25 जून की आधी रात को आपातकाल की घोषणा की गई तो दमन का सबसे क्रूर चक्र बिहार पर ही चलाया गया। आपातकाल लागू होते ही देश के तमाम बड़े नेताओं के साथ-साथ बिहार के भी हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और छात्रों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जे पी आंदोलन जो मूलतः एक व्यापक उद्देश्यों को लेकर शुरू किया गया छात्र आंदोलन था । जिसका श्रेय अगर किसी एक व्यक्ति को दिया जा सकता है तो वो हैं श्री राम बहादुर राय । पूरे हिंदुस्तान ने तो आपातकाल का दंश 25 जून 1975 के बाद झेला है । पर श्री राम बहादुर राय ने इसका दंश काफी पहले यानि 8 अप्रैल 1974 से झेलना शुरू कर दिया था। इसी दिन मीसा (मेंटेनेंस इंडिया सेक्युरिटी एक्ट ) के अंतर्गत पटना में पहली गिरफ्तारी हमसबों के समक्ष ही राय साहब की हुई थी। ये वो काला कानून था जिसको न्यायालय में भी चुनौती नहीं दी जा सकती थी।-हरि प्रकाश लाटा, जेपी सेनानी
मीसा और डीआईआर जैसे काले कानूनों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए किया गया। बिहार की जेलें ठसाठस भर गईं। लेकिन दमनकारी नीतियां आंदोलनकारियों के हौसलों को पस्त नहीं कर सकीं। कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, शरद यादव और सुशील कुमार मोदी जैसे युवा जेपी के सिपाहियों ने जेल के भीतर और बाहर रहकर इस दमन के खिलाफ मोर्चा संभाले रखा। कर्पूरी ठाकुर जैसे जमीन से जुड़े नेता ने भूमिगत रहकर बिहार के गांवों में घूम-घूमकर प्रतिरोध की अलख जगाए रखी। उन्हें पकड़ने में पूरी सरकारी मशीनरी नाकाम साबित हुई। यह बिहार की उस मिट्टी का चरित्र था जो दमन के सामने झुकना नहीं जानती थी। प्रेस पर सेंसरशिप लागू थी। अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई थी और सच बोलने पर पाबंदी थी। बावजूद इसके बिहार में गुप्त पर्चों और भूमिगत पत्रिकाओं के माध्यम से वैचारिक प्रतिरोध जारी रहा। सत्ता यह भूल गई थी कि विचारों को कभी भी संगीनों के दम पर कैद नहीं किया जा सकता। बिहार के संदर्भ में आपातकाल को याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसी दौर ने भारतीय राजनीति को उसका नया नेतृत्व प्रदान किया। आज हम उत्तर भारत और विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार आदि की राजनीति में जिन चेहरों और जिन वैचारिक धाराओं को देखते हैं उनकी नर्सरी आपातकाल के उस संघर्ष में ही तैयार हुई थी।
समाजवाद की जो नई खेप उस दौर में पैदा हुई उसने आने वाले दशकों तक देश की राजनीति की दिशा तय की। लेकिन इस पचास साल के सफरनामे में एक कड़वा सच यह भी है कि जिस सामाजिक न्याय और संपूर्ण क्रांति का सपना देखकर लोगों ने जेल की यातनाएं सही थीं, क्या वह सपना पूरी तरह साकार हो पाया। आज जब हम अतीत के उस झरोखे से वर्तमान को देखते हैं तो कई अंतर्विरोध साफ नजर आते हैं। आपातकाल के खिलाफ लड़ने वाले नेताओं ने बाद के दिनों में सत्ता के गलियारों में अपनी जगह बनाई। कई बड़े बदलाव भी हुए। लेकिन बिहार की बुनियादी समस्याएं जैसे गरीबी, पलायन और जातिवाद की राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकीं। सत्ता का चरित्र अक्सर बदलने के बाद भी वैसा ही हो जाता है जैसा कि वह पहले था और यही इस देश के लोकतांत्रिक संघर्ष की सबसे बड़ी त्रासदी रही है।
फिर भी आपातकाल के विरुद्ध बिहार का वह संघर्ष हमेशा इस बात की गवाही देता रहेगा कि जनता की ताकत से बड़ी कोई सत्ता नहीं होती। पचास साल का समय एक लंबा कालखंड होता है जिसमें एक पूरी पीढ़ी बदल जाती है। आज की युवा पीढ़ी, जिसने आपातकाल के उस भयावह दौर को नहीं देखा, उसके लिए यह सिर्फ इतिहास की किताबों का एक पन्ना हो सकता है। लेकिन यह पन्ना हमें यह सिखाता है कि लोकतंत्र कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे एक बार हासिल कर लेने के बाद हमेशा के लिए सुरक्षित मान लिया जाए। लोकतंत्र को हर दिन, हर दौर में नागरिकों की सतर्कता और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता से सींचना पड़ता है। आपातकाल के दौरान जब न्यायपालिका को पंगु बनाने की कोशिश की गई। जब संसद की संप्रभुता को एक व्यक्ति की इच्छा के अधीन करने का प्रयास हुआ, तब बिहार की जनता ने यह दिखाया कि लोकतांत्रिक संस्थाएं अगर कमजोर भी हो जाएं तो जनभावनाएं कभी कमजोर नहीं होतीं।
पटना का गांधी मैदान केवल एक मैदान नहीं है, बल्कि वह भारतीय लोकतंत्र की उस अंतरात्मा का प्रतीक है जो वक्त-वक्त पर सत्ता के अहंकार को चुनौती देती रही है। आपातकाल की इस 50वीं वर्षगांठ पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें आत्ममंथन की सख्त जरूरत महसूस होती है। बिहार ने 1975 में जो राह दिखाई थी, वह राह थी डरे बिना सच कहने की। सत्ता की ज्यादतियों के सामने तनकर खड़े होने की और सिद्धांतों के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की। आज वक्त है उन गुमनाम सेनानियों को नमन करने का जिन्होंने जेलों में अमानवीय यातनाएं सहीं परंतु लोकतंत्र की मशाल को बुझने नहीं दिया। अब हमारा यह दायित्व बनता है कि हम उस चेतना को जीवित रखें।
आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर उस काले दौर का पुनर्स्मरण किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। बल्कि यह उस लोकतांत्रिक जिजीविषा का उत्सव है जिसने तानाशाही को परास्त किया था। 50 साल बाद भी आपातकाल की प्रासंगिकता यही है कि वह हमें याद दिलाता रहता है कि आजादी की कीमत हमेशा सतर्कता ही होती है। इस ऐतिहासिक मोड़ पर यह जरूरी है कि उन यादों को, उस संघर्ष को और उस वैचारिक दृढ़ता को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाए। ताकि सनद रहे कि जब भी देश पर संकट आएगा। पूरा देश एकजुट होकर अपनी पूरी ताकत के साथ लोकतंत्र की ढाल बनकर खड़ा रहेगा।