इमरजेंसीः एक काला अध्याय
50 साल पहले के उस त्रासद सच सच को जीवंत रखने के लिए हिंदुस्थान समाचार समूह पिछले एक साल से लगातार विशेष कार्यक्रमों की श्रृंखला चला रहा है। इसकी शुरुआत 26 जून 2025 को नई दिल्ली में इमरजेंसी पर एक विशेष कार्यक्रम से हुई।

इमरजेंसीः एक काला अध्याय

नवोत्थान    03-Jul-2026
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25 जून 1975 की वह काली रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास पर एक ऐसा कलंक है, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। उस दिन लोकतंत्र पर अब तक का सबसे क्रूर प्रहार किया गया था। आज हम उस दौर को पीछे छोड़ आए हैं। बावजूद इसके इतिहास के इन काले पन्नों को बार-बार पलटने की जरूरत है। नई पीढ़ी को यह बताना बेहद जरूरी है कि लोकतंत्र कोई खैरात में मिली वस्तु नहीं है। इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी है। 50 साल पहले के उस त्रासद सच सच को जीवंत रखने के लिए हिंदुस्थान समाचार समूह पिछले एक साल से लगातार विशेष कार्यक्रमों की श्रृंखला चला रहा है। इसकी शुरुआत 26 जून 2025 को नई दिल्ली में इमरजेंसी पर एक विशेष कार्यक्रम से हुई। इसमें समाचार समूह से जुड़े हरेक व्यक्ति ने काले कपड़े पहनकर इमरजेंसी का सांकेतिक विरोध जताया।

इस कड़ी का दूसरा कार्यक्रम 19 सितंबर को सूरत में हुआ और तीसरा कार्यक्रम 8 अक्टूबर को लखनऊ में संपन्न हुआ। इस श्रृंखला का चौथा कार्यक्रम इस साल 19 फरवरी को भोपाल में और पांचवा कार्यक्रम अब 24 जून को पटना में अनुष्ठित हो रहा है। आज उस काले अध्याय को याद करना इस संकल्प के साथ है कि वह दौर अब फिर कभी नहीं आये। ​इमरजेंसी विशुद्ध रूप से अपनी कुर्सी बचाए रखने की एक व्यक्तिगत छटपटाहट थी। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया, तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने पूरे देश को जेलखाने में तब्दील कर दिया। ​आज की युवा पीढ़ी, जिसने सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की असीम आजादी के दौर में आंखें खोली है। उसके लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि एक ऐसा वक्त भी था जब सरकार के खिलाफ बोलना तो दूर, सोचना भी अपराध था। मीसा जैसे कानूनों के जरिए बिना किसी वारंट के गिरफ्तारियां हुईं। हर विरोधी आवाज को डरा-धमका कर दबा दिया गया। आधी सदी बाद पीछे मुड़कर देखना केवल इतिहास को याद करना नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए सचेत होना भी है।

जो समाज अपने इतिहास की गलतियों को भूल जाता है, वह उन्हें दोबारा दोहराने के लिए अभिशप्त होता है। इमरजेंसी का भुक्तभोगी रहा हिंदुस्थान समाचार समूह पिछले साल भर से निरंतर युवाओं को उस दौर की विभीषिका से रूबरू करा रहा है। उस दौरान नागरिकों से उनके जीने का अधिकार तक छीन लिया गया था। कानून का शासन खत्म हो चुका था और केवल एक व्यक्ति की सनक ही देश का कानून बन गई थी। उस कालखंड को बार-बार याद दिलाना किसी राजनीतिक दल को कोसने के लिए नहीं, बल्कि देश में संवैधानिक सतर्कता बनाए रखने के लिए जरूरी है। युवाओं को इस बात का अहसास होना चाहिए कि जो स्वतंत्रता उन्हें आज सहज उपलब्ध है, उसे बचाने के लिए हजारों लोगों ने लाठियां खाई थीं, जेलों में यातनाएं झेली थीं और अपनी जान गंवाई थी। इसलिए उन 21 महीनों के जुल्म और ज्यादतियों को बार-बार याद किया जाना चाहिए ताकि सनद रहे कि भविष्य में फिर कभी कोई शासक अपनी सत्ता की लिप्सा के लिए देश के संविधान और लोकतंत्र को बंधक बनाने का दुस्साहस न कर सके।