सांस्कृतिक पुनरुत्थान के 12 साल

15 Jul 2026 16:11:57


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बद्रीनाथ वर्मा
प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का पिछले 12 वर्षों का कालखंड केवल शासन या सत्ता परिवर्तन का गवाह नहीं रहा बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर उभरा है। इस अवधि ने भारत के सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक स्वरूप को तो संवारा ही है। लेकिन सबसे गहरा और अमिट प्रभाव भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य पर छोड़ा है।

किसी भी जीवंत राष्ट्र की यात्रा में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं, जहां खड़े होकर पीछे देखने पर परिवर्तन की व्यापकता और आगे देखने पर संभावनाओं का विस्तार स्पष्ट दिखाई देता है। बीते 12 वर्षों की भारत की यात्रा भी एक ऐसा ही ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह यात्रा एक ऐसे आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत की कहानी है जो अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करता है। वर्तमान में पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ा है और भविष्य के प्रति नए संकल्पों के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है। आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के सफल 12 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। तब यह अवसर केवल प्रशासनिक उपलब्धियों को गिनाने का नहीं है। यह उस व्यापक वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन को समझने का क्षण है जिसने भारत के सामर्थ्य पर देशवासियों के अटूट विश्वास को और अधिक दृढ़ किया है।
बीते 12 वर्षों का कालखंड केवल शासन या सत्ता परिवर्तन का गवाह नहीं रहा बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर उभरा है। इस अवधि ने भारत के सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक स्वरूप को तो संवारा ही है। लेकिन सबसे गहरा और अमिट प्रभाव भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य पर छोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को एक नई ऊर्जा और भव्यता प्रदान की है। इस सांस्कृतिक पुनरुत्थान के केंद्र में हमारी आस्था और अस्मिता के प्रतीकों का पुनरुद्धार रहा है।
सदियों की लंबी प्रतीक्षा और संघर्ष के बाद अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक मंदिर का निर्माण न होकर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, उज्जैन में महाकाल लोक का अलौकिक निर्माण और केदारनाथ धाम का व्यापक पुनर्विकास जैसी परियोजनाओं ने भारत की आध्यात्मिक धरोहर को न केवल सहेजा है बल्कि उन्हें एक वैश्विक पहचान भी दिलाई है। सांस्कृतिक गौरव की इस पुनर्स्थापना का विस्तार सोमनाथ मंदिर के नए स्वरूप से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर में कामाख्या मंदिर कॉरिडोर के विकास और कश्मीर में शारदा पीठ के पुनरुद्धार के संकल्प तक दिखाई देता है। इसके साथ ही, अतीत में भारत से चोरी छिपे ले जाई गईं तमाम बहुमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों और मूर्तियों चाहे वह काशी की अधिष्ठात्री देवी मां अन्नपूर्णा हों या नटराज को वापस देश में लाना। इस सरकार की सांस्कृतिक सजगता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता है।
अतीत में भारत से चोरी छिपे ले जाई गईं तमाम बहुमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों और मूर्तियों चाहे वह काशी की अधिष्ठात्री देवी मां अन्नपूर्णा हों या नटराज को वापस देश में लाना। मोदी सरकार की सांस्कृतिक सजगता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता है।
भारतीय संस्कृति के प्रति यह सम्मान केवल प्राचीन प्रतीकों तक सीमित नहीं है। देश के इतिहास के विस्मृत कर दिए गए महानायकों और बलिदानियों को भी मुख्यधारा में उचित स्थान मिला है। सिख गुरुओं के साहिबजादों के बलिदान को नमन करता 'वीर बाल दिवस', विभाजन की विभीषिका को याद करता 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' और भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर 'जनजातीय गौरव दिवस' की शुरुआत इसी वैचारिक चेतना के हिस्से हैं। लाल किले पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा की स्थापना और कर्तव्य पथ पर गुलामी के प्रतीकों को हटाकर भारतीय स्वाभिमान को स्थापित करना इस बात का उद्घोष है कि यह कालखंड औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का कालखंड है।
पिछले 12 वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी स्वयं भारतीय संस्कृति, योग, अध्यात्म और सनातन मूल्यों के एक प्रभावी और सशक्त संवाहक के रूप में विश्व मंच पर उभरे हैं। भारत की 'सॉफ्ट पावर' को दुनिया भर में स्थापित करने में उनका योगदान ऐतिहासिक है। इसका सबसे अनुपम उदाहरण योग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। प्रधानमंत्री मोदी के पुरजोर प्रयासों और वैश्विक आह्वान के कारण ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 21 जून को 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' घोषित किया गया। आज दुनिया का कोना-कोना भारत की इस प्राचीन पद्धति को अपना रहा है। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और वैश्विक नेतृत्व का एक अनूठा उदाहरण है।
इसी कड़ी में आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए जामनगर में डब्ल्यूएचओ के वैश्विक केंद्र की स्थापना ने भारत को विश्व कल्याण के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और वैश्विक नेतृत्व का एक अनूठा उदाहरण है। यह सांस्कृतिक विस्तार केवल देश की सीमाओं के भीतर ही नहीं बल्कि वैश्विक धरातल पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी में विशाल और भव्य मंदिर का निर्माण। बहरीन में श्रीनाथजी मंदिर का जीर्णोद्धार और जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान कोणार्क चक्र और नटराज की विशाल प्रतिमा के माध्यम से वैश्विक राष्ट्राध्यक्षों के सामने भारत की दार्शनिक और सांस्कृतिक श्रेष्ठता का प्रदर्शन। इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आज सनातन संस्कृति को विश्व पटल पर अत्यंत आदर और स्वीकार्यता मिल रही है।
बहरहाल, यह 12 वर्ष की अवधि प्रशासनिक सीमाओं से कहीं आगे बढ़कर राष्ट्र के मानस को बदलने वाली सिद्ध हुई है। आज का भारत अपनी पहचान को लेकर हीनभावना से मुक्त है। वह आधुनिकता को गले लगा रहा है लेकिन अपनी जड़ों को छोड़े बिना। विकास भी और विरासत भीका यह अटूट मंत्र देश के कोने-कोने में गूंज रहा है। विरासत और विकास के इस अद्भुत समन्वय ने देशवासियों के भीतर एक नए भारत के निर्माण का आत्मविश्वास भरा है। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण ही आने वाले समय में एक विकसित और विश्व-गुरु भारत की नींव को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।

(लेखक नवोत्थान के संपादक हैं)

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