भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान दौर में जहां एक ओर सूचना की गति अभूतपूर्व हुई है। वहीं, दूसरी ओर विश्वसनीयता, वैचारिक संतुलन और सांस्कृतिक दृष्टि को लेकर गंभीर प्रश्न भी खड़े हुए हैं। ऐसे समय में भारत की पहली बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार अपने मूल ध्येय राष्ट्र सर्वोपरि, भारतीय भाषाओं का सम्मान और सकारात्मक पत्रकारिता के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है। 10 अप्रैल 1948 को प्रख्यात चिंतक दादा साहेब आप्टे द्वारा स्थापित इस एजेंसी को साल 2000 में महान कर्मयोगी श्रीकांत जोशी ने नवजीवन प्रदान किया। तबसे यह संस्थान लगातार आगे बढ़ते हुए आज 15 भारतीय भाषाओं में समाचार प्रेषण का कार्य कर रहा है। हाल ही में सर्वसम्मति से हिंदुस्थान समाचार समूह के पुनः अध्यक्ष निर्वाचित हुए अरविन्द भालचंद्र मार्डीकर से पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक, फेक न्यूज, भारतीय भाषाओं और राष्ट्रदृष्टि पर डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंशः
आप वर्ष 2016 से हिन्दुस्थान समाचार के नेतृत्व से विभिन्न भूमिकाओं में जुड़े रहे हैं। इस लंबे अनुभव ने आपको एजेंसी की मूल चेतना और भविष्य के बारे में क्या सिखाया?
सबसे बड़ी सीख मुझे “संयम” की मिली। पत्रकारिता का क्षेत्र निरंतर चुनौतियों से भरा रहता है। हर चुनौती अलग होती है और वह बिना पूर्व सूचना के सामने आती है। ऐसे समय धैर्य बनाए रखना सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। मेरा स्पष्ट मानना है कि हिन्दुस्थान समाचार की स्थापना अत्यंत मजबूत वैचारिक नींव पर हुई थी। हमारे पूर्वजों ने इसे केवल एक समाचार एजेंसी के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के माध्यम के रूप में खड़ा किया। यही कारण है कि समय बदला, तकनीक बदली, मीडिया का स्वरूप बदला लेकिन हिन्दुस्थान समाचार की मूल चेतना नहीं बदली। हम राष्ट्र सर्वोपरि की भावना के साथ आगे बढ़े हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे। मुझे विश्वास है कि इस कारण से हिंदुस्थान समाचार का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।
डिजिटल और सोशल मीडिया के इस दौर में पारंपरिक समाचार एजेंसियों के सामने विश्वसनीयता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। हिन्दुस्थान समाचार इसे कैसे देखता है?
यदि समाचार सत्य, संतुलित और तथ्यों पर आधारित है, तो विश्वसनीयता की चुनौती स्वतः समाप्त हो जाती है। आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म सूचना को तेजी से लोगों तक पहुंचाने के साधन हैं। हम उन्हें विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी माध्यम मानते हैं। हिन्दुस्थान समाचार ने नई तकनीकों को अपनाते हुए विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी मजबूत उपस्थिति बनाई है। लेकिन मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आज भी पारंपरिक पत्रकारिता पर लोगों का भरोसा सबसे अधिक है। यही कारण है कि समाचार पत्रों की प्रासंगिकता बनी हुई है। हमारा मानना है कि भविष्य उसी का है जो पारंपरिक विश्वसनीयता और आधुनिक तकनीक, दोनों को साथ लेकर चले।
आपके नेतृत्व में एजेंसी की संपादकीय प्राथमिकताओं में क्या नए आयाम देखने को मिलेंगे?
हमारी स्थापना ही भारतीयता और राष्ट्रदृष्टि को केंद्र में रखकर हुई थी। हमें संस्कारों से सकारात्मक सोच और राष्ट्रहित की शिक्षा मिली है। इसलिए हमारे लिए दिशा बदलने या भ्रमित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। हम सकारात्मक पत्रकारिता में विश्वास करते हैं। समाज को तोड़ने, भ्रम फैलाने या नकारात्मकता बढ़ाने के बजाय हम रचनात्मक विमर्श को महत्व देते हैं। भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और जनभावनाओं को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करना ही हमारी प्राथमिकता है।
आज ‘फेक न्यूज’ सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। ऐसी स्थिति में आपकी एजेंसी की तथ्य-पुष्टि नीति क्या है?
यह सही है कि फेक न्यूज के शुरुआती दौर में कई बड़े मीडिया संस्थान भी भ्रमित हुए। लेकिन हमने उससे सीख ली। हमने अपनी कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार किए। किसी भी समाचार को जारी करने से पहले आधिकारिक स्रोत, विशेषज्ञों की राय, तथ्य और प्रमाणों की गंभीर जांच की जाती है। हमारी स्पष्ट नीति है- “सत्य समाचार, जस का तस।”
छोटे शहरों और क्षेत्रीय पत्रकारों को सशक्त बनाने के लिए हिन्दुस्थान समाचार क्या कर रहा है?
भारत का वास्तविक स्वररूप छोटे शहरों और गांवों में बसता है। इसलिए क्षेत्रीय संवाददाताओं को मजबूत करना हमारे लिए प्राथमिकता है। हमने आधुनिक मोबाइल एप विकसित किया है, जिसके माध्यम से संवाददाता कहीं से भी समाचार लिख सकते हैं, फोटो जोड़ सकते हैं और तुरंत अपलोड कर सकते हैं। विभिन्न भाषाओं के पत्रकारों के साथ नियमित वर्चुअल संवाद भी होता है। हम प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और मनोबल बढ़ाने पर विशेष ध्यान देते हैं। किसी भी संवाददाता के अच्छे कार्य की सराहना करना हमारी कार्य संस्कृति का हिस्सा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों के दौर में एजेंसी किस प्रकार तैयारी कर रही है?
तकनीक से दूर रहकर पत्रकारिता का भविष्य नहीं बनाया जा सकता। हिन्दुस्थान समाचार पहले से क्लाउड आधारित न्यूज़ प्रोसेसिंग सिस्टम और मोबाइल एप का उपयोग कर रहा है। एआई को लेकर हमारी वरिष्ठ टीम लगातार काम कर रही है। हाल ही में हमने “भाषिणी” प्लेटफॉर्म के साथ साझेदारी की है और उसका बड़ा हिस्सा हमारे सिस्टम से जुड़ चुका है। भारतीय भाषाओं के विस्तार और त्वरित अनुवाद में यह तकनीक बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही है।
आज सबसे बड़ी चुनौती सूचनाओं के शोर में सत्य को बचाए रखना और सबसे बड़ी संभावना भारतीय समाज की जड़ों से जुड़ी सकारात्मक पत्रकारिता के पुनर्जागरण में है। हम चुनौतियों को संकट के बजाय अवसर मानते हैं। — अरविन्द भालचंद्र मार्डीकर, अध्यक्ष हिन्दुस्थान समाचार समूह
भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को आप किस रूप में देखते हैं?
मेरे अनुसार भारतीय भाषाओं का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। चुनौतियां अवश्य हैं, लेकिन संभावनाएं उससे कहीं अधिक बड़ी हैं। भारत विविध भाषाओं और संस्कृतियों का देश है। यही विविधता हमारी शक्ति है। हिन्दुस्थान समाचार का सबसे बड़ा बल यही है कि वह एक साथ 15 भारतीय भाषाओं में कार्य कर रहा है और प्रत्येक भाषा को समान सम्मान देता है।
आपके पिछले कार्यकाल की कौन-सी उपलब्धियां आपको सबसे अधिक संतोष देती हैं?
कई उपलब्धियां हैं जो संतोष देती हैं, जैसे कि जीएसटी रजिस्ट्रेशन, प्रशासनिक पारदर्शिता, कार्य विभाजन, अनुशासन, आर्थिक नियोजन और समय पर सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन। इसमें भी सबसे बड़ा संतोष इस बात का है कि संस्था निरंतर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही है।
युवा पत्रकारों और मीडिया विद्यार्थियों के लिए आपका क्या संदेश है?
यदि कोई अच्छा पत्रकार बनना चाहता है तो उसे सामान्य ज्ञान, इतिहास और अपनी भाषा पर मजबूत पकड़ बनानी होगी। केवल तकनीक से पत्रकारिता नहीं होती। अच्छा साहित्य पढ़ना चाहिए, वरिष्ठ पत्रकारों और प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनियां पढ़नी चाहिए। सकारात्मक सोच, जागरुकता और बेदाग आचरण, ये तीन बातें पत्रकार को दीर्घकाल तक सम्मान दिलाती हैं।
हिन्दुस्थान समाचार को अक्सर एक विशेष वैचारिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जाता है। आप इसे कैसे देखते हैं?
हम निश्चित रूप से एक विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं-और वह है राष्ट्र सर्वोपरि। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। पक्षधर होना स्वाभाविक है, लेकिन पक्षपाती होना गलत है। हम राष्ट्रहित, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक समरसता के पक्षधर हैं, परंतु पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं हैं। हम सभी विचारों को स्थान देते हैं, लेकिन राष्ट्रविरोधी दृष्टिकोण को सामान्य विमर्श का हिस्सा मानना उचित नहीं समझते।
आज मीडिया पर बाजार, टीआरपी और राजनीतिक ध्रुवीकरण का दबाव दिखाई देता है। ऐसे समय में संतुलन बनाए रखना कितना कठिन है?
कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। यदि मीडिया बिकाऊ नहीं है और पक्षपात से दूर है, तो उसे डरने की आवश्यकता नहीं है। हम सनसनी से अधिक सत्य को महत्व देते हैं। सबसे तेज बनने की अंधी दौड़ से दूर रहते हुए हम न्यूज की सत्यता व गुणवत्ता की नीति पर काम करते हैं। भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता करना हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। जमीन से जुड़े संवाददाता ही हमारी वास्तविक ताकत हैं।
अंत में, यदि आपको भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी संभावना को एक-एक वाक्य में बताना हो तो आप क्या कहेंगे?
सबसे बड़ी चुनौती है सूचना की अति के बीच सत्य को सुरक्षित रखना और सबसे बड़ी संभावना है भारतीय समाज की जड़ों से जुड़ी सकारात्मक पत्रकारिता का पुनर्जागरण। हम चुनौतियों को संकट नहीं, अवसर मानते हैं। हिन्दुस्थान समाचार उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।