शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य को समझना होना चाहिए। यह कहना है देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या का। उनका दावा है कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय एक ऐसा वातावरण दे रहा है जहां विद्यार्थी यह सीख सके कि उसे 'क्या बनना है' से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसे 'कैसा बनना है'। डॉ. पंड्या से नवोत्थान के संपादक बद्रीनाथ वर्मी की बातचीत के संपादित अंशः
आज जब शिक्षा व्यवसाय बन गया है। ऐसे में देव संस्कृति विश्वविद्यालय की क्या प्रासंगिकता है?
देखिए, आज दुनिया के पास जानकारी यानी इन्फॉर्मेशन बहुत है। लेकिन विवेक अर्थात विज्डम की कमी है। डीएसवीवी की उपयोगिता इसी अंतराल को भरने में है। हम यहां केवल 'कैरियर' नहीं, 'कैरेक्टर' बनाने पर जोर देते हैं। यहां शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि आत्म-रूपांतरण है। हमारी उपयोगिता इस बात में है कि हम समाज को ऐसे शिक्षित मानव दे रहे हैं जो न केवल तकनीकी रूप से सक्षम हैं, बल्कि नैतिक रूप से भी सुदृढ़ हैं।
विश्वविद्यालय के मुख्य उद्देश्य क्या हैं और यह अन्य संस्थानों से कैसे अलग है?
हमारा मूल उद्देश्य 'सा विद्या या विमुक्तये' (शिक्षा वह है जो मुक्त करे) है। पूज्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने इसकी नींव इसी संकल्प के साथ रखी थी कि यहां से 'देव मानव' निकलें। यहां 'इंटर्नशिप' का अर्थ कॉर्पोरेट जगत में काम करना नहीं है। अनिवार्य रूप से एक महीने का समाज सेवा (समयदान) करना है।
हाल के वर्षों में विश्वविद्यालय ने कौन सी प्रमुख उपलब्धियां हासिल की हैं?
योग और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए हमारे नाम कई कीर्तिमान हैं। हमने बाल्टिक संस्कृति एवं अध्ययन केंद्र स्थापित किया है। एशिया में यह अपनी तरह का पहला केंद्र है। हमारे 'यज्ञोपैथी' और 'योग' विभाग वैश्विक स्तर पर शोध कर रहे हैं। हाल ही में हमने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में नैतिकता, करुणा और विवेक की अनिवार्यता पर एक अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन आयोजित की।
भविष्य को लेकर आपका क्या रोडमैप है? विशेषकर तकनीकी युग में आप देव संस्कृति विश्वविद्यालय को कहां देखते हैं?
भविष्य की हमारी योजनाएं बहुत स्पष्ट हैं। हम तकनीक के विरोधी नहीं हैं। बस यह चाहते हैं कि तकनीक का उपयोग मानवीय संवेदनाओं के साथ हो। हम ऐसे शोध केंद्र बना रहे हैं जो ‘एथिक्स इन टेक्नोलॉजी’ पर काम करें। दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर भारतीय जीवन दर्शन को वैश्विक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने को लेकर भी हम सक्रिय हैं। इसके अलावा आयुर्वेद के क्षेत्र में नए क्लीनिकल ट्रायल और दुर्लभ जड़ी-बूटियों के संरक्षण के लिए अपनी प्रयोगशालाओं का विस्तार कर रहे हैं।