विज्ञान और कला का अद्भुत मिश्रण है दंत चिकित्साः डॉ. संजय लाभ
विज्ञान और कला का अद्भुत मिश्रण है दंत चिकित्साः डॉ. संजय लाभ

विज्ञान और कला का अद्भुत मिश्रण है दंत चिकित्साः डॉ. संजय लाभ

नवोत्थान    28-Jul-2026
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Dr. Labh 

मेधा सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। यह साबित किया है डॉ. संजय लाभ ने। गुदड़ी के लाल डॉ. लाभ का जन्म बिहार के एक ऐसे सुदूर गांव में हुआ जहां आज भी रेलवे स्टेशन नहीं है। साधारण परिवार में जन्में डॉ. लाभ की शुरुआती पढ़ाई लिखाई घर पर ही हुई। पांचवीं परीक्षा पास करने के बाद उनकी आगे की पढ़ाई झाझा में और उसके बाद पटना डेंटल कॉलेज से मेडिकल की डिग्री ली। एक सफल दंत चिकित्सक के रूप में सेंटर फॉर डेंटल केयर के जरिए अपनी सेवा दे रहे डॉ. लाभ के पास न केवल दिल्ली एनसीआर बल्कि देश के कोने-कोने यहां तक कि विदेशों से भी पेशेंट आते हैं। देश के अग्रणी ऑर्थोडॉन्टिस्ट एवं लिंगुअल ऑर्थोडॉन्टिक्स के अग्रदूत डॉ. संजय लाभ से विशेष बातचीत की नवोत्थान के संपादक बद्रीनाथ वर्मा ने। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंशः

आपकी सफलता का सफर काफी प्रेरणादायक है। अपने बारे में कुछ बताएं?

मेरा जन्म नेपाल सीमा से सटे मिथिलांचल के एक ऐसे गांव में हुआ जहां आज भी रेलवे स्टेशन नहीं है। अब तो सड़क मार्ग से वहां जाया जा सकता है लेकिन उस समय बैलगाड़ी ही आवागमन का साधन हुआ करती थी। पांचवीं तक की पढ़ाई घर पर ही हुई। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए मुझे मेरे परिजनों ने फूफाजी के पास झाझा भेज दिया। वहां से मैंने इंटर पास की।

चिकित्सा के क्षेत्र में आपका सफर कैसे शुरू हुआ और दंत चिकित्सा ही क्यों?

स्कूली शिक्षा के दौरान ही मुझे विज्ञान और मानव शरीर रचना में रुचि पैदा हुई जिसने आगे चलकर मुझे चिकित्सा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। शुरू से ही मेरा मानना था कि चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का एक बड़ा माध्यम है। मेरी हमेशा से सोच रही है कि किसी व्यक्ति की मुस्कान उसके आत्मविश्वास का सबसे बड़ा हिस्सा होती है। जबड़े और दांतों की समस्या से जूझ रहे लोगों के जीवन में मुस्कान वापस लाना और उनका दर्द दूर करना ही मेरा सबसे बड़ा उद्देश्य बन गया।

हायर एजुकेशन की यात्रा कैसी रही?

पटना डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल से स्वर्ण पदक के साथ बीडीएस की उपाधि प्राप्त की। वहां हर सब्जेक्ट में टॉपर रहा। बीडीएस डिग्री के बाद डेंटल कॉलेज में मैंने दो वर्षों तक शिक्षण कार्य भी किया। इसके बाद तमिलनाडु गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल, चेन्नई से एमडीएस ऑर्थोडॉन्टिक्स की डिग्री ली। वहां भी यूनिवर्सिटी द्वारा शीर्ष स्थान के लिए स्वर्ण पदक मिला। एमडीएस के बाद मुझे स्कॉटलैंड के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग से एम.आर्थ आरसीएस प्राप्त करने का सौभाग्य मिला जिसे हासिल करने वाला मैं सबसे कम उम्र के भारतीयों में से था। इसके अलावा न्यूयॉर्क से आईसीओआई की फेलोशिप भी मिली।

दंत चिकित्सा को लेकर आपका व्यक्तिगत दृष्टिकोण क्या है?

मेरा व्यक्तित्व हमेशा से ही सीखने और इनोवेशन पर केंद्रित रहा है। मैं आज भी अपने क्षेत्र के नए शोधों और तकनीकों से अपडेट रहता हूं। अपने पेशेंट के साथ दोस्ताना व्यवहार और उनकी समस्याओं को गहराई से समझना मेरी कार्यशैली का मुख्य हिस्सा है। जब मैं उन्हें ठीक होकर मुस्कुराते हुए देखता हूं, तो मुझे सबसे अधिक खुशी व संतुष्टि मिलती है। दांत केवल भोजन चबाने के लिए नहीं हैं, बल्कि ये पाचन तंत्र की पहली सीढ़ी हैं। मुंह की खराब सेहत सीधे तौर पर हृदय रोग और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी हो सकती है। स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ दांत अत्यंत आवश्यक हैं। दांतों की उचित देखभाल, सही खान-पान और समय पर चिकित्सकीय परामर्श कई गंभीर बीमारियों से बचाता है।

लिंगुअल ऑर्थोडॉन्टिक के बारे में कुछ बताइए?

जब मैंने अपने करियर की शुरुआत की तब पारंपरिक ब्रेसेस काफी आम थे। लेकिन लोग, खासकर युवा और पेशेवर, ऐसे ब्रेसेस लगाने से हिचकिचाते थे क्योंकि वे बाहर से दिखाई देते थे। तब हमने 'इंस्टीट्यूट ऑफ लिंगुअल ऑर्थोडॉन्टिक्स' की स्थापना की। लिंगुअल ब्रेसेस दांतों के पीछे (अंदरूनी हिस्से में) लगाए जाते हैं जिससे वे बाहर से दिखाई नहीं देते। मुझे एम्स नई दिल्ली में आयोजित प्रथम नेशनल लिंगुअल ऑर्थोडॉन्टिक कांफ्रेंस (2013) के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी और 2014 के 'द लिंगुअल समिट' के साइंटिफिक चेयरमैन के रूप में सेवा देने का अवसर मिला।

आपके यहां किस तरह की सुविधाएं हैं?

हम आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करते हुए दर्द-मुक्त उपचार पर जोर देते हैं। चाहे डेंटल इंप्लांट हो, आरसीटी हो या फिर सर्जरी, हम लेजर तकनीक और डिजिटल इमेजिंग का उपयोग करते हैं। हमारा मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज बिना किसी डर के क्लिनिक से संतुष्ट होकर बाहर निकले। हमारे यहां न केवल दिल्ली एनसीआर बल्कि देश के कोने-2 यहां तक कि विदेशों से भी पेशेंट इलाज कराने आते हैं। मुझे भारतीय ऑर्थोडॉन्टिक सोसायटी के मानद सचिव के रूप में कार्य करने का मंच मिला। इससे मुझे देश भर के डॉक्टरों और जरूरतमंदों तक बेहतर दंत चिकित्सा सेवाएं पहुंचाने और ज्ञान साझा करने का अवसर मिला।

आप समाज सेवा में भी सक्रिय हैं। इतनी व्यस्तता के बावजूद कैसे मैनेज करते हैं?

परिवार से मिले संस्कार हैं। बचपन से ही मेरे मन में शिक्षा और समाज सेवा के प्रति गहरा लगाव था। घर-परिवार का परिवेश ही ऐसा था जहां मेहनत, ईमानदारी और दूसरों की मदद करने की आदत पड़ी। मेरा मानना है कि एक चिकित्सक का दायित्व केवल क्लिनिक तक सीमित नहीं होता। समाज की मदद करना भी उसका दायित्व है। अपने इस दायित्व के निर्वहन के लिए हम समय-समय पर स्कूलों और कॉर्पोरेट स्तरों पर मौखिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाते हैं। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों के लिए सेंटर फॉर डेंटल केयर के जरिए रियायती या मुफ्त इलाज की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाती है।

युवा डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

मैं यही कहूंगा कि दंत चिकित्सा विज्ञान और कला का एक अद्भुत मिश्रण है। इसमें तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ धैर्य और सहानुभूति बहुत जरूरी है। अपने मरीजों को सिर्फ एक 'केस' न समझें, उनके साथ विश्वास का रिश्ता बनाएं। लगातार सीखते रहें और हमेशा सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता प्रदान करने का प्रयास करें। तकनीक रोज़ बदल रही है। खुद को अपडेट रखना अनिवार्य है। पेंशेंट सेंट्रिक रहिए। संवेदना बनाए रखें। मरीज आपके पास केवल इलाज के लिए नहीं, भरोसे के लिए आता है। पैसे से ज्यादा प्राथमिकता पेशेंट के स्वास्थ्य और उसकी संतुष्टि को दें।