
शिवकुमार बिलगरामी
भारतीय संस्कृति में ‘प्रणाम’ केवल अभिवादन की औपचारिक क्रिया नहीं अपितु एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जो व्यक्ति को व्यक्ति से, पीढ़ी को पीढ़ी से और समाज को उसके मूल्यों से जोड़ती है। प्रणाम का अर्थ है अपने अहं का क्षय कर दूसरे के अस्तित्व, अनुभव और गरिमा को स्वीकार करना।
दो व्यक्तियों के बीच सेतु का कार्य करने वाला अभिवादन केवल कुछ शब्दों अथवा हाव-भाव की औपचारिकता का आदान-प्रदान नहीं अपितु यह समाज की मूल्य व्यवस्था के साथ-साथ समाज की नैतिक और परस्पर संबंधों की समझ का संकेतक है। दरअसल, अभिवादन किसी भी सभ्यता की आत्मा का प्रथम परिचय है। जिस प्रकार भाषा किसी संस्कृति का व्याकरण होती है उसी प्रकार अभिवादन उसकी संवेदना का व्याकरण है। भारतीय सभ्यता में प्रणाम केवल शिष्टाचार या अभिवादन की औपचारिक क्रिया नहीं है बल्कि यह विनय, श्रद्धा और आत्मानुशासन का सजीव संस्कार है। यह वह मौन भाषा है, जिसमें शब्दों से अधिक भाव बोलते हैं।
विश्व की सभी सभ्यताओं में अभिवादन की अपनी दीर्घकालिक परम्पराएं हैं। पाश्चात्य समाज में हैंडशेक करके या फिर हेलो-हाय, गुड मॉर्निंग अथवा गुड इवनिंग बोलकर या आलिंगन कर अथवा गाल पर हल्का चुंबन कर एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं। कुछ देशों में हाथ हिलाकर (वेविंग) अथवा सर झुका कर (नोडिंग) के द्वारा भी अभिवादन की परंपरा है। इस्लामी सभ्यता में सलाम (अस्सलामु अलैकुम बोलकर), मुसाफ़हा (समान लिंग के व्यक्तियों द्वारा हाथ मिलाना), मुआनका (आलिंगन) तथा सीने पर हाथ रख कर अथवा सिर झुकाकर अभिवादन की विभिन्न रीतियां प्रचलन में हैं।
बहरहाल, विश्व की अन्य सभ्यताओं के इतर भारतीय सभ्यता में अभिवादन की समृद्ध परंपरा रही है। भारतीय उपमहाद्वीप की प्रत्येक भाषाई संस्कृति में अलग-अलग शब्दों, क्रियाओं और हाव-भावों के साथ अभिवादन करने की रीति का प्रचलन है। लेकिन इन सब में वैदिक काल से चली आ रही अभिवादन की रीतियों का कुछ न कुछ पुट मिलता है। वैदिक काल में शिक्षा केन्द्रों के रूप में जब ऋषि परंपरा के अंतर्गत आश्रमों और गुरुकुलों का संचालन होता था तब आश्रम अथवा गुरुकुल में प्रवेश लेने वाले वटुक शिष्य को सबसे पहले प्रणाम अथवा अभिवादन करने की बाकायदा शिक्षा दी जाती थी।
भारतीय परंपरा में प्रणाम को केवल अभिवादन के रूप में नहीं अपितु श्रद्धा, विनय और आत्मसमर्पण के अत्यंत उदात्त भाव के रूप में अपनाया गया है। वयोवृद्ध, पदवृद्ध और ज्ञानवृद्ध सबके लिए प्रणाम की अलग-अलग रीतियों को अपनाया गया है। संभवतः भारतीय संस्कृति विश्व की ऐसी पहली संस्कृति थी जिसमें अभिवादन के महत्व को इतनी गहराई से समझा गया था। अभिवादन के महत्व के अनुरूप ही प्रणाम करने की विधियों का आविष्कार हुआ था। प्रणाम करने की प्रमुख विधियां इस प्रकार थीं – प्रणाम या नमस्कार, पंचांग प्रणाम, साष्टांग/अष्टांग प्रणाम और दंडवत प्रणाम।
सामान्य रूप से हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करने की रीति रही है। माता-पिता, गुरू, राजा और देवता को पंचांग प्रणाम का विधान बताया गया है। पंचांग प्रणाम का अर्थ है शरीर के पांचो अंगों-दोनों घुटने, दोनों हाथों की कोहनी तथा सिर या मस्तक को भूमि से स्पर्श करते हुए प्रणाम करना। इसी तरह साष्टांग प्रणाम या अष्टांग प्रणाम में दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों घुटने, छाती और मस्तक भूमि को स्पर्श करते हैं। यह प्रणाम अत्यंत श्रद्धा और भक्ति का सूचक है। आमतौर पर इस तरह का प्रणाम मंदिरों में देव मूर्तियों अथवा विशेष पूजा अनुष्ठानों में करने की परंपरा रही है।
भारतीय सभ्यता में प्रणाम शिष्टाचार या अभिवादन की औपचारिक क्रिया भर नहीं है, बल्कि विनय, श्रद्धा और आत्मानुशासन का सजीव संस्कार है। यह वह मौन भाषा है, जिसमें शब्दों से अधिक भाव बोलते हैं।
इन सबसे अलग प्रणाम की एक और विधि है दंडवत प्रणाम। दंड का अर्थ है सीधी खड़ी लकड़ी। जिस तरह कोई सीधी खड़ी लकड़ी अथवा दंड को छोड़ दिया जाए तो वह भूमि पर एकदम सीधा गिरता है। इसी तरह दंडवत प्रणाम करने वाला व्यक्ति भी जिसको दंडवत प्रणाम करता है उसके सामने दोनों हाथों को लम्बवत आगे कर सीधा भूमि पर लेट जाता है। इस तरह का प्रणाम पूर्ण रूपेण आत्मसमर्पण की ओर इंगित करता है। यह प्रणाम मुख्यतः वैष्णव संप्रदाय की परंपरा के रूप में प्रचलित रहा है और वैष्णव भक्त अपने आराध्य के समक्ष इसी तरह दंडवत प्रणाम करते रहे हैं। अत्यधिक प्रगाढ़ श्रद्धा भाव के अनुरूप यह प्रणाम अपने गुरुजनों और अन्य वरिष्ठ जनों को भी किया जाता है।
जाहिर है भारतीय संस्कृति में ‘प्रणाम’ केवल अभिवादन की औपचारिक क्रिया नहीं अपितु एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जो व्यक्ति को व्यक्ति से, पीढ़ी को पीढ़ी से और समाज को उसके मूल्यों से जोड़ती है। प्रणाम का अर्थ है अपने अहं का क्षय कर दूसरे के अस्तित्व, अनुभव और गरिमा को स्वीकार करना। आधुनिकता, तकनीक और तेज़ जीवन-गति के इस युग में जब मानवीय संवेदनाएं लुप्त होती जा रही हैं, तब प्रणाम की सामाजिक प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। प्रणाम के अनेक रूप यह बताते हैं कि सम्मान केवल शब्दों से नहीं बल्कि देह, मन और भाव तीनों के समर्पण से प्रकट होता है। ‘अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः’ जैसी सूक्तियां बताती हैं कि प्रणाम व्यक्ति के चारित्रिक विकास, विनय और सामाजिक संतुलन का आधार है। यह संस्कार व्यक्ति को नम्र बनाता है और समाज को सुसंस्कृत।
आधुनिक समाज में संबंधों की संरचना बदली है। संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवारों ने ले लिया है। औपचारिकता बढ़ी है और संवाद में आत्मीयता घटती जा रही है। समाज उपलब्धियों, पद, प्रतिष्ठा और उपभोग की संस्कृति से संचालित हो रहा है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति स्वयं को केंद्र में रखकर देखने लगा है। ऐसे वातावरण में प्रणाम अहंकार-विसर्जन का एक सहज और प्रभावी सामाजिक अभ्यास बन सकता है। जब कोई व्यक्ति गुरु, माता-पिता, वरिष्ठजन या किसी आदर्श के समक्ष प्रणाम करता है तो वह अनजाने ही यह स्वीकार करता है कि उसका जीवन केवल व्यक्तिगत श्रम का परिणाम नहीं, बल्कि संस्कार, परंपरा और समाज की संयुक्त देन है। यह भाव व्यक्ति के भीतर संतुलन, कृतज्ञता और मानसिक विनम्रता को जन्म देता है।
प्रणाम जैसी परंपराएं केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद की सहज भाषा बन सकती हैं। जब एक युवा किसी वरिष्ठ को प्रणाम करता है तो वह केवल आयु का नहीं, अनुभव और ज्ञान का सम्मान करता है। वहीं वरिष्ठ के मन में भी अपनत्व और उत्तरदायित्व का भाव जागृत होता है। यानी प्रणाम पीढ़ियों के बीच सेतु का कार्य करता है। प्रणाम की विशेषता यह है कि इसमें शारीरिक संपर्क की अनिवार्यता नहीं, फिर भी भावनात्मक निकटता प्रबल होती है। महामारी जैसे वैश्विक संकटों ने भी यह सिद्ध किया कि भारतीय अभिवादन पद्धतियां स्वास्थ्य, शालीनता और संवेदना तीनों की दृष्टि से अधिक उपयुक्त हैं।
सामाजिक समरसता की दृष्टि से भी प्रणाम का महत्त्व उल्लेखनीय है। यह जाति, वर्ग और पद की सीमाओं को लांघकर मानवीय समानता का बोध कराता है। जब एक व्यक्ति दूसरे को झुककर प्रणाम करता है, तो वह अपने भीतर के अहंकार को भी प्रणाम करता है। यही भाव सामाजिक टकराव को कम कर सौहार्द को बढ़ाता है।
बहरहाल, प्रणाम कोई अप्रासंगिक परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक मूल्य है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसे रूढ़ि नहीं, बल्कि संवेदना और संवाद के सशक्त माध्यम के रूप में समझें और अपनाएं। तकनीक से भरे इस युग में यदि मनुष्य, मनुष्य को देखकर झुकना सीख ले तो समाज अधिक मानवीय, अधिक संतुलित और अधिक संस्कारित बन सकता है। यही प्रणाम की कालजयी सामाजिक प्रासंगिकता है।
( लेखक लोकसभा के पूर्व संयुक्त निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं)